धामी की हार के साथ ही हिलोरे खाने लगी सीएम बनने की ख्वाहिशें

सीएम बनने के लिए अतीत में दर्ज है अपनों की ही कब्र खोदने का राजनीतिक प्रपंच
धामी की हार से बिगड़ गए नेता चुनने का समीकरण, राजनीतिक स्थिरता देना सबसे बड़ी चुनौती,

Dehradun: सब कुछ लगभग ठीक ही चल रहा था लेकिन खटीमा से मतगणना शुरू होने के साथ ही जो आंकड़े मिल रहे थे उससे भाजपा के माथे की शिकन भी बढ़ती जा रही थी। वह चेहरा जिसे उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2022 के लिए केंद्रीय हाईकमान मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुका था वह लगातार कांग्रेस प्रत्याशी से पिछड़ रहा था। जैसे-जैसे मतगणना के चरण बढ़ते रहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीत का रास्ता और अधिक मुश्किल बनता रहा। अंततः शाम तक यह साबित हो गया कि भाजपा के लिए 6 महीने में ग्राउंड जीरो पर अपना पसीना बहाने वाले पुष्कर सिंह धामी अब विधायक नहीं बनने वाले।

धामी की हार के साथ ही उत्तराखंड भाजपा का पूरा समीकरण ही बिगड़ गया और तलाश शुरू हो गई एक ऐसे नाम की जिसे सर्वमान्य तौर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के लिए जनता से लेकर हाईकमान तक की पसंद बना जा सके। उत्तराखंड का अतीत मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के लिए अपनों का ही गला दबाने और भितरघात करने के लिए पहचाना जाता है और अब तो प्रचंड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री चुना जाना है, लिहाजा इस सूरत में कहीं राजनीति का एक और पुराना अध्याय ना दोहराया जाए?

होना तो यह चाहिए की जनता के निर्णय का मान रखते हुए निर्वाचित विधायकों में से ही कोई ऐसा नाम चुना जाए जो उत्तराखंड के विकास की राह पर अपनी टीम को लेकर आगे बढ़े लेकिन धानी की हार के साथ ही नए नए नाम उभरने लगे हैं जिसे असमंजस का माहौल बनने लगा है। स्थिति वाकई बेहद अप्रत्याशित और चुनौतीपूर्ण है। इस परिस्थिति से निपटने के लिए केंद्र हाईकमान को जनता के विश्वास को जीतना होगा और इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि राजनीतिक स्थिरता का जो तमका भाजपा के दामन पर लगा हुआ है उसे हमेशा के लिए मिटाया जाए।

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