तपता पहाड़, बिगड़ता संतुलन, निभानी होगी संयुक्त जिम्मेदारी – Bhilangana Express

तपता पहाड़, बिगड़ता संतुलन, निभानी होगी संयुक्त जिम्मेदारी


समूचा भारत भीषण गर्मी की चपेट में है तो वही नौतपा से उत्तराखंड भी अछूता नहीं रह गया है। उत्तराखंड में बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम का असर अब पहाड़ों तक साफ दिखाई देने लगा है। जंगलों में आग, पानी के स्रोत सूखना, बिजली की बढ़ती खपत और स्वास्थ्य समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में सरकार और आम लोगों—दोनों को मिलकर काम करना होगा। अभी जरूरी हो गया है कि उत्तराखंड के लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों के बारे में गंभीरता से सोचना होगा।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण है पानी का संरक्षण इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। पहाड़ों में प्रकृति की कृपा के बावजूद पानी की बेहद कमी है और इसके लिए वर्षा के पानी को प्रयोग करने के लिए राज्य सरकार को बड़ी योजनाएं लानीहोगी। खास तौर से पारंपरिक धारे, नौले और चाल-खालों का पुनर्जीवन करना होगा जो आज लगभग समाप्त होते चले जा रहे हैं। पहाड़ों में सबसे बड़ी समस्या अब कूड़े को लेकर भी हो रही है जिसके कारण जंगल गर्मी में आग की सबसे बड़ी वजह बन रहे हैं।

मुख्य तौर पर चीड़ के पत्तों (पिरूल) के प्रबंधन पर गंभीर काम हो। या तो एक सामान्य सी बात है की प्रकृति का संरक्षण अधिक से अधिक पेड़ लगाकर ही हो सकता है लेकिन जिस प्रकार से विकास के नाम पर हजारों लाखों की संख्या में पेड़ काटे गए हैं वह एक चिता का विषय है। यहां
सिर्फ पौधे लगाना नहीं, उनकी देखभाल भी जरूरी है। सूरज की तपिश बढ़ने के साथ ही तमाम स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी उत्तराखंड में देखने को मिल रही है। गर्मी में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन बढ़ रहे हैं, और इसका एक साधारण सा उपाय है अधिक से अधिक मात्रा में स्वच्छ जल का सेवन किया जाए। बहुत तेज धूप में बाहर निकलने से बचें।

देवभूमि उत्तराखंड में अनियोजित निर्माण पर रोक लगनी चाहिए।
पहाड़ों में तेजी से हो रहा कंक्रीट निर्माण तापमान बढ़ा रहा है।
पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर विकास कार्य हों। पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए। पहाड़ों के बिगड़ते पर्यावरणीय असंतुलन से बचने के लिए जल संकट वाले क्षेत्रों की पहचान कर विशेष योजना बनानी होगी।

उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण और संतुलित विकास पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। आज उत्तराखंड अपनी भौगोलिक पहचान कोटा जा रहा है और कहीं ना कहीं इसके लिए राज्य गठन के बाद यहां का ए नियोजित विकास भी जिम्मेदार है।