
समुद्र के गर्भ से अंतरिक्ष की गहराइयों तक भारतीय वैज्ञानिकों ने कायम की शानदार मिसाल
मौसम परिवर्तन के अध्ययन की विधाओं एव तकनीक के बारे में दी जानकारी
भूकंप एवं सुनामी के पर्वानुमान के बेहतरीन आंकड़े पेश कर रहा है इनकोइस (INCOIS)
पीआईबी देहरादून द्वारा आयोजित अध्ययन टूर में पत्रकारों ने जाने समुद्रीय एवं अंतरिक्ष ज्ञान के छिपे रहस्य
Hyderabad: समुद्र की गहराइयों में कई अनसुलझे रहस्य छिपे हुए हैं। प्राचीन काल में कथा है की समुद्र मंथन के दौरान कई दुर्लभ वस्तुएं निकली थी लेकिन आज भारत के वैज्ञानिक इसी समुद्र से वह जानकारियां जनहित में निकाल रहे हैं जो न केवल मनुष्य के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुकी है बल्कि आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से बचने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


उत्तराखंड देहरादून प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो द्वारा उत्तराखंड के 15 पत्रकारों को भारत सरकार के कुछ ऐसे दुर्लभ विज्ञान एवं तकनीकी संस्थानों का दौरा कराया जा रहा है जहां से दुर्लभ जानकारियां भारत के वैज्ञानिक समुद्र मंथन के समान ही डाटा संग्रहण से बाहर निकल रहे हैं।
यह संस्थान आज जलवायु परिवर्तन की विभिन्न विधाओं को समुद्र के गर्भ में चल रहे परिवर्तन चक्र से जानने का प्रयास करता है। मौसम का पूर्वानुमान आज हमारे दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है और इसका संपूर्ण चक्र इस संस्थान के वैज्ञानिक समुद्र में चल रही गतिविधियों के डाटा के आधार पर प्राप्त करते हैं।
हैदराबाद का यह संस्थान केवल तकनीकी सेवाएं प्रदान करने वाला केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य के डिजिटल भारत की आधारशिला है।
भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक एम श्रीनिवासन ने संस्थान की गतिविधियों और यहां प्रयोग की जाने वाली तकनीक के बारे में पत्रकारों को विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आज भारत न केवल मौसम के पूर्वानुमान में दक्षता हासिल कर रहा है बल्कि उसकी जानकारियां सटीक भी साबित हो रही है। सेटेलाइट के माध्यम से प्राप्त होने वाली जानकारी का डाटा मौसम में होने वाले परिवर्तन से लेकर साइबर सुरक्षा में प्रयोग किया जा रहे हैं, जिसमें रिमोट सेंसिंग की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।
डॉ एम श्रीनिवासन ने बताया कि भारत में मौसम के पूर्वानुमान की जानकारी की सटीकता लगभग 85% है, लेकिन जिस पर प्रकार से भारत में मानसून एवं अन्य प्रकार से जलवायु परिवर्तन के कारण बनते हैं उससे यह आंकड़ा लगभग 10 से 15% तक कम हो जाता है, हालांकि इसके बावजूद संस्थान मजबूत और बेहतरीन आंकड़े सराहनीय तौर पर प्रस्तुत कर रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ वर्षों में भारत विज्ञान की इस तकनीक में और अधिक दक्ष होने के साथ सटीक आंकड़े प्रस्तुत करने जा रहा है।

पीआईबी देहरादून द्वारा आयोजित किए गए इसी अध्ययन दौरे के तहत पत्रकारों को सुनामी सेंटर का भी अनुभव कराया गया, जहां प्रेजेंटेशन के दौरान आज ही इंडोनेशिया में मात्र आधा घंटा पूर्व आए लगभग 5.02 रिएक्टर के भूकंप के ताजा आंकड़े और उसके प्रभाव को दिखाया गया।

संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा समुद्र में होने वाली हलचल को मापने वाले विभिन्न यंत्रों का भी प्रदर्शन किया गया जिसमें जी3 स्टॉकम ग्लाइडर के कार्य करने के तरीके को विस्तार के साथ वैज्ञानिकों ने बताया।
पीआईबी अधिकारी संजीव सुन्द्रियाल ने बताया कि इस अध्ययन दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत सरकार द्वारा विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उन्नति एवं क्रांति के विकास के बारे में जन सामान्य तक जानकारियां उपलब्ध कराना है।