अपने मुंह मियां मिट्ठू पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के दावे – Bhilangana Express

अपने मुंह मियां मिट्ठू पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के दावे

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3 दिन और, सामने आ जाएगी दावे की हेकड़ी
आसानी से बनेगी बहुमत की सरकार या दी जाएगी राजनीतिक नैतिकता की तिलांजलि

Dehradun: 60 प्लस या 48 प्लस! उत्तराखंड में अब सब को इस बात का इंतजार है कि 10 मार्च को बंद पिटारे से क्या निकलने वाला है? तमाम दावे करने वाले नेताओं के बड़े-बड़े बोल या फिर अति आत्मविश्वास से भरे दावे क्या असर दिखाएंगे, यह दिन चढ़ने के साथ साथ साफ हो जाएगा। सीधे तौर पर चुनौती भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस के बीच ही है और दोनों ने ही पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का दावा किया है।

इधर प्रदेश की राजधानी में अभी से असमंजस और थोड़ा डर दोनों ही दलों के नेताओं में नजर आने लगा है। बैठकों का दौर शुरू हो चुका है तो वही सेटिंग के गेम को लेकर भी खुद को “हनुमान” समझने वाले नेताओं ने हाथ पैर मारने शुरू कर दिए हैं। उधर कांग्रेस अपनी जिताऊ प्रत्याशियों की लोकेशन को लेकर पूरी तरह से सतर्क है क्योंकि पार्टी के नेता जानते हैं कि सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी हर वह हथकंडा अपना सकती है जो नैतिकता के परिधि में नहीं आता।

मतदान के रोज से भाजपा भितरघात के आरोपों से घिरी हुई है और अपने ही प्रदेश अध्यक्ष को कई प्रत्याशियों ने निशाने पर लिया है जिसका संज्ञान केंद्र हाईकमान द्वारा भी लिया गया है और इस दिशा में भी प्रदेश संगठन के अंदर कोई बड़ा बदलाव नजर आने वाला है। निश्चित तौर पर भाजपा जो मतदान के दिन से पहले खुद को सुरक्षित स्थिति में समझ रही थी आज वह सत्ता में अपनी पारी दोहराने के लिए चिंतित है।

इधर कांग्रेस एक उम्मीद लगाए बैठी है कि शायद परिवर्तन की लहर का उसे फायदा मिल जाए और उत्तराखंड में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार सत्तासीन हो जाए। हालांकि खुद कांग्रेस भी पार्टी की अंतरकलह से पार नहीं पा सकी है, हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जरूर अपने प्रयासों से कांग्रेस को मजबूत बनाने की थोड़ी कोशिश जरूर की है और इसी कोशिश का परिणाम है कि आज कांग्रेस खुद को सत्ता में वापसी की राह में खड़ा पा रही है।

समीक्षा एवं विश्लेषण के दिन अब अधिक नहीं रह गए हैं, 3 दिन बाद यह निश्चित हो जाएगा कि उत्तराखंड में सत्ता की लहर किस तरफ बहने वाली है? सरकार पूर्ण बहुमत की बनेगी या फिर सरकार बनाने के लिए राजनीति के सिद्धांतों की बलि चढ़ाई जाएगी?