बड़े साहब के आगे “शेखचिल्ली” बनने की जुगत में नप गए

बड़े मैदान में बड़े साहब के आगे रावण जलने को तैयार था, लेकिन इधर तो रावण का “आचरण” किसी और के ही शरीर में समा गया था।
मैदान में पूरे नजारे को कैद करने के लिए कलमवीर भी मैदान में जुटे थे, तो उधर खाकीधारी भी ड्यूटी पर मुतैद नजर आ रहे थे, लेकिन कहते हैं ना कि आसपास की संगत का असर किसी न किसी पर तो पड़ ही जाता है… रावण का चरित्र कुछ पल के लिए कब किस पर चढ़ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बस कुछ पल में ही ऐसा हुआ कि “बुद्धि पर रावण चरित्र का अतिक्रमण” हो गया। इधर कलमवीर अपने काम को पूरा करने के लिए “मौका एं वारदात” पर तैयार खड़ा था लेकिन एक खाकीधारी सब के आगे शेखचिल्ली बनने के लिए अपनी सीमाएं ही भूल गया।

दशानन दहन देखने के लिए आए बड़े साहब के आगे ही कलमवीर को धकिया कर अपने “अदम्य साहस” का परिचय देते हुए खाकीधारी “सिंघम” बन गया। अजब नजारा देख कर अब बड़े साहब से लेकर मैदान पर मौजूद लोग भी दांतों तले उंगली दबाने पर विवश हो गए और उन्हें लगा कि कहीं रावण का चरित्र पुतले से बाहर निकाल कर किसी “मानव विशेष” में तो प्रवेश नहीं कर गया। इधर बुद्धि ने पलटा खाया और चंद मिनट में ही बड़े साहब के आगे खाकी की छवि का “गुड का गोबर” कर डाला।

लेकिन अब तो तीर कमान से निकल चुका था, कमान से निकला हुआ तीर वापस तो आ नहीं सकता था, अभी तो रावण के “अहंकार का दहन” भी नहीं हो पाया था कि उधर सोशल मीडिया पर “नोटिफिकेशन” घनघनाने लगे थे, खाकीधारी का कारनामा व्हाट्सएप से लेकर फेसबुक और फेसबुक से लेकर आला अधिकारियों के मोबाइल पर टकटकी लगाए फोकस होकर देखा जाने लगा।

वाकई!! बड़ा ही शर्मनाक दृश्य…. उन कलमवीरों को मैदान से खदेड़ा जा रहा था जिनकी कलम से मित्र पुलिस का दावा करने वाली यह संस्था अपना प्रचार प्रसार कराती है। विडंबना ही है कि जिले के “बड़े साहब” विभाग की छवि बनाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं तो उधर मातहत पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

“जंगे-मैदान” में खाकीधारी को कदाचित कही ना कहीं यह मुगालता हो गया था कि वह “सबसे बड़े साहब” के आगे आम जनता को खदेड़ कर वाहवाही बटोर लेंगे, लेकिन उनका यही अति उत्साह “सिर मुंडाते ओले पड़ना” के समान बन गया, इस अजीब कारनामे की फाइल चंद घंटे में चल पड़ी जो लाइन हाजिर से लेकर निलंबन के पड़ाव तक जा पहुंची।

यहां एक तरफ जिले के “बड़े साहब” ने जनपद की विभागीय छवि सुधारने के लिए बेहद कम समय में अपनी जान फूंक दी है, जनता से सुझाव मांगने से लेकर चंद क्षणों में आम जनता की समस्याओं के निराकरण का बीड़ा उठा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ जिनसे काम करवाना है वही बेलगाम हो जाए तो साहब भी क्या करें??? अब शायद उन्हें भी लगने लगा होगा कि जनता को सुधारने से पहले अपने ही विभाग में सुधार की जरूरत है ताकि इस प्रकार से सरेआम गरिमा की धज्जियां न उड़े।